ग्लोबल न्यूज़ इंडिया कुलविंदर सिंह जालंधर चंडीगढ़ – पंजाब में पुलिसिंग और कानून-व्यवस्था एक बार फिर चिंता का केंद्र बनी हुई है। पिछले तीन वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि गंभीर अपराधों पर लगाम लगाने के सरकारी दावों और जमीनी हकीकत में बहुत बड़ा फर्क है। आतंकी गिरोहों के खिलाफ ‘एनकाउंटर’ की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है, लेकिन आम आदमी के लिए सुरक्षा का माहौल बनता नहीं दिख रहा। हाल ही में बने ‘क्राइम कंट्रोल डिपार्टमेंट’ (सीसीडी) की कार्रवाइयों पर भी सवाल उठ रहे हैं कि कहीं यह कानून का राज स्थापित करने के बजाय एक ‘समानांतर पुलिस बल’ तो नहीं बन गया है।
आंकड़ों से साफ: गिरोह और ड्रग्स का बढ़ता साया
पंजाब पुलिस की असफलता को समझने के लिए पिछले कुछ सालों के आंकड़े देखना जरूरी है।
· गिरोहों का खौफ: केवल तीन साल (2023 से मार्च 2025 तक) में राज्य में 569 एफआईआर दर्ज की गई हैं, जिसमें आम लोगों ने गिरोहों से धमकी मिलने की शिकायत की है। इनमें से 220 शिकायतें 2023 में, 279 शिकायतें 2024 में और 70 शिकायतें सिर्फ 2025 के पहले तीन महीनों में दर्ज हुई हैं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है।
· जेलों में हिंसा: अपराधियों पर काबू पाने में पुलिस की नाकामी का असर जेलों तक में दिख रहा है। 2023 में देश की जेलों में हुए कुल 98 झड़पों या समूह-झड़पों में से 60% (59 झड़पें) सिर्फ पंजाब की जेलों में हुईं। यह देश में सबसे ज्यादा है।
· ड्रग्स की महामारी: पंजाब की जेलों में देश के किसी भी राज्य से ज्यादा, कुल 27.4% (2,267 कैदी) नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट (एनडीपीएस) के दोषी कैदी हैं। यह समस्या इतनी विकराल है कि पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने इसे राज्य के लिए ‘अस्तित्व का संकट’ करार दिया है।
पंजाब जेलों की चिंताजनक स्थिति (2023 के आंकड़े)
· असामान्य मौतें: पूरे देश में सबसे ज्यादा 20 (13 आत्महत्याएं, 3 हत्याएं, 4 दुर्घटनाएं)
· झड़पें/गुट झड़पें: देश की कुल झड़पों का 60% (59 झड़पें)
· एनडीपीएस दोषी कैदी: देश में सबसे ज्यादा, कुल का 27.4% (2,267 कैदी)
· कैदी संख्या (कैपेसिटी के मुकाबले): 118.8% (कैपेसिटी: 26,543; मौजूद कैदी: 31,529)
नया ‘तोड़’, पुराने सवाल: क्राइम कंट्रोल डिपार्टमेंट
इन बढ़ते अपराधों से निपटने के नाम पर पंजाब सरकार ने मई 2024 में पुलिस के भीतर ही एक नया क्राइम कंट्रोल डिपार्टमेंट (सीसीडी) बनाया। इस विभाग को 6 अरब रुपये से ज्यादा के शुरुआती बजट के साथ खड़ा किया गया, जिसमें अफसरों के लिए शानदार गाड़ियां खरीदने का भी प्रावधान है। इसके गठन का आधार यह था कि 2016 से 2025 के बीच पंजाब में समग्र अपराध दर में 37% की बढ़ोतरी हुई है।
हालांकि, इस विभाग को लेकर शुरू से ही आलोचना हो रही है। पूर्व पुलिस महानिदेशक आसिफ नवाज वरैच जैसे जानकारों का कहना है कि नया विभाग बनाने के बजाय मौजूदा थाना व्यवस्था में सुधार की जरूरत थी। विपक्ष के नेता मलिक अहमद खान भच्चर ने आरोप लगाया है कि इस विभाग का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को परेशान करने के लिए किया जा रहा है।
‘एनकाउंटर’ का दौर: कानून हाथ में?
सीसीडी के गठन के बाद से ही पुलिस मुठभेड़ों यानी ‘एनकाउंटर’ की संख्या में अचानक उछाल आया है। अगस्त 2025 तक राज्य में हुए कुल 780 से ज्यादा पुलिस मुठभेड़ों में से 500 से अधिक सिर्फ सीसीडी द्वारा की गई हैं। जून 2025 के अंत में एक हफ्ते के भीतर सीसीडी ने ‘शाह गैंग’ नामक गिरोह के 9 भगोड़ों को अलग-अलग मुठभेड़ों में ढेर कर दिया।
इन मुठभेड़ों को लेकर विवाद गहराया हुआ है। कुछ मामलों में, जनता ने ऐसी कार्रवाई का स्वागत किया है, जैसे हाफिजाबाद में एक महिला के सामूहिक बलात्कार के आरोपियों के एनकाउंटर के बाद। वहीं, मानवाधिकार कार्यकर्ता और पूर्व पुलिस अधिकारी इन्हें ‘अतिरिक्त-न्यायिक हत्याएं’ बता रहे हैं। पूर्व आईजी डॉ. सैयद कलीम इमाम कहते हैं, “राज्य को हमेशा नैतिक तरीके से काम करना चाहिए… कानून लागू करने वालों को कानून के शासन का पालन करना चाहिए, न कि उसके बाहर काम करना।”
पुलिस के भीतर की लड़ाई और भविष्य
पुलिस की छवि सुधारने के लिए कुछ कदम भी उठाए गए हैं। हाल ही में, पंजाब पुलिस ने 52 पुलिसकर्मियों (कांस्टेबल से इंस्पेक्टर तक) को भ्रष्टाचार और आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में नौकरी से निकाल दिया। पुलिस महानिदेशक गौरव यादव ने ‘काले भेड़ों’ पर कार्रवाई का ऐलान किया है।
निष्कर्ष: पंजाब पुलिस एक जटिल चुनौती से जूझ रही है। एक तरफ वह गिरोहों और ड्रग तस्करों से सख्ती से निपटने का दावा कर रही है, तो दूसरी तरफ उसके तरीकों पर कानून के शासन से परे जाने के सवाल उठ रहे हैं। आने वाले समय में सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या सीसीडी जैसे विशेष विभाग वाकई अपराध पर काबू पाने में कारगर साबित होंगे, या फिर वे सिर्फ पुलिस मुठभेड़ों की संख्या बढ़ाने और राजनीतिक दबाव का औजार बनकर रह जाएंगे। जब तक पुलिस थानों की बुनियादी व्यवस्था, जनता का विश्वास और पारदर्शिता नहीं सुधरती, तब तक पंजाब के लिए सुरक्षा और शांति का सपना अधूरा ही रहेगा।
पिछले 3 साल: आतंकी गिरोह और ‘एनकाउंटर’ के बीच फंसी पंजाब पुलिस
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